फिर दुख की बात। हद है।
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मां सही कहती थी परछाई को देखते देखते पागल हो जाओगे। मैं परछाई के पीछे ही तो पागल हो रहा हूं। जो बीत गया है वो इकट्ठा है कहीं पर मैं उसे अकेला नहीं छोड़ता... उसे निचोड़ता चलता हूं, हर दृश्य में... ध्वनि में, शब्द में... दुख में, सुख में... जबकि वो अपने हाथ जोड़ मुझसे अपने को छोड़ देने की गुहार लगा चुका है। और भविष्य... भविष्य तो जैसे कह कहकर थक ही गया है कि आगे आओ... और मैं हूं कि... खैर..
शाम है। धीमे धीमे ये सारे दृश्य अंधेरा खा जायेगा। कुछ नहीं बचेगा।
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Stuck in time
No flow
Not a single wave
To carry the body across
Nothing moves
Nothing remains
Have you seen a thought
With it's bare body
Voluptuous figure
Alluring
Hiding
Still having control over you.
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